सोमवार, 6 जनवरी 2014

लाल बहादुर शास्त्री (जीवन आदर्श, प्रतिभा)

लाल बहादुर शास्त्री (जीवन आदर्श, प्रतिभा) 

लाल बहादुर शास्त्री जी का जन्म शारदा श्रीवास्तव प्रसाद, स्कूल अध्यापक व रामदुलारी  देवी. के घर मुगलसराय(अंग्रेजी शासन के एकीकृत प्रान्त), में हुआ जो बाद में इलाहाबाद के राजस्व विभाग में बाबू हो गए ! बालक जब 3 माह का था, गंगा के घाट पर माँ की गोद से फिसल कर चरवाहे की टोकरी (cowherder's basket) में जा गिरा! चरवाहे, के कोई संतान नहीं थी, उसने बालक को इश्वर का उपहार मान, घर ले गया ! लाल बहादुर के माता पिता ने पुलिस में बालक के खोने की सूचना लिखाई तो पुलिस ने बालक को खोज निकाला और माता पिता को सौंप दिया।
बालक डेढ़ वर्ष का था, जब पिता का साया उठने पर माता उसे व उसकी 2 बहनों के साथ लेकर मायके चली गई तथा वहीँ रहने लगी. लाल बहादुर 10 वर्ष की आयु तक अपने नाना हजारी लाल के घर रहे! तथा मुगलसराय के रेलवे स्कुल में कक्षा IV शिक्षा ली, वहां उच्च विद्यालय न होने के कारण बालक को वाराणसी भेजा गया जहाँ वह अपने मामा के साथ रहे, तथा आगे की शिक्षा हरीशचन्द्र हाई स्कूल से प्राप्त की ! बनारस रहते एक बार लाल बहादुर अपने मित्रों के साथ गंगा के दूसरे तट मेला देखने गए! वापसी में नाव के लिए पैसे नहीं थे! किसी मित्र से उधार न मांग कर, बालक लाल बहादुर नदी में कूदते हुए उसे तैरकर पार कर गए। 
बाल्यकाल में, लाल बहादुर को पुस्तकें पढ़ना भाता था, विशेषकर गुरु नानक के छंद।  उन्होंने कहा कि भारतीय राष्ट्रवादी, समाज सुधारक एवं स्वतंत्रता सेनानी श्रद्धेय बाल गंगाधर तिलक. वाराणसी 1915 में महात्मा  गाँधी का भाषण सुनने के पश्चात् लाल बहादुर ने अपना जीवन देश सेवा को समर्पित कर दिया!  महात्मा  गाँधी के असहयोग आन्दोलन 1921 में लाल बहादुर ने निषेधाज्ञा का उलंघन करते प्रदर्शनों में भाग लिया ! जिस पर उन्हें बंदी बनाया गया, किन्तु अवयस्क होने के कारण छूट गए ! फिर वे काशी विद्यापीठ  वाराणसी में भर्ती हुए! वहां के 4 वर्षों में वे डा. भगवान दास के, दर्शन पर व्याख्यान से अत्यधिक प्रभावित हुए! तथा राष्ट्रवादी में भर्ती हो गए ! काशी विद्यापीठ से 1926, शिक्षा पूरी करने पर उन्हें शास्त्री की उपाधि से विभूषित किया गया, जो विद्या पीठ की सनातक की उपाधि है, जो उनके नाम का अंश बन गया ! वे 'सर्वेन्ट्स ऑफ़ द पीपल सोसाईटी' के आजीवन सदस्य बन कर, मुजफ्फरपुर में हरिजनॉं के उत्थान में कार्य करना आरंभ कर दिया, बाद में संस्था के अध्यक्ष भी बने
1927 में, जब शास्त्री जी का शुभ विवाह मिर्ज़ापुर की ललिता देवी से संपन्न हुआ तो भारी भरकम दहेज़ का चलन था किन्तु शास्त्रीजी ने केवल एक चरखा व एक खादी  का कुछ गज का टुकड़ा  ही दहेज़ स्वीकार किया ! 1930 में, महात्मा  गाँधी के नमक सत्याग्रह के समय वे स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े, तथा ढाई वर्ष का कारावास हुआ एकबार, जब वे बंदीगृह में थे, उनकी एक बेटी गंभीर रूप से बीमार हुई, तो उन्हें स्वतंत्रता संग्राम में भाग न लेने की शर्त पर 15 दिवस की सशर्त छुट्टी दी गयी ! परन्तु उनके घर पहुँचने से पूर्व ही बेटी का निधन हो चुका था ! बेटी के अंतिम संस्कार पूरे कर, वे अवधि पूरी होने से पूर्व ही स्वयं कारावास लौट आये !  एक वर्ष पश्चात् उन्होंने एक सप्ताह के लिए घर जाने की अनुमति मांगी, जब उनके पुत्र को श्‍लैष्मिक ज्‍वर हो गया था ! अनुमति भी मिल गयी, किन्तु पुत्र एक सप्ताह मैं निरोगी नहीं हो पाया तो अपने परिवार के अनुग्रहों, के बाद भी अपने वचन के अनुसार वे कारावास लौट आये
8 अगस्त 1942, महात्मा गाँधी ने मुंबई के गोवलिया टेंक में अंग्रेजों भारत छोडो की मांग पर भाषण दिया ! शास्त्री जी जेल से छूट कर सीधे पहुंचे जवाहरलाल नेहरु के गृहप्रदेश इल्लहाबाद और आनंद भवन से एक सप्ताह स्वतंत्रता सैनानियों को निर्देश देते रहे ! कुछ दिन बाद वे फिर बंदी बनाकर कारवास भेज दिए गए और वहां रहे 1946 तक, शास्त्री जी कुल मिला कर 9 वर्ष जेल में रहे  जहाँ वे पुस्तकें पड़ते रहे और इस प्रकार पाश्चात्य पश्चिमी दार्शनिकों, क्रांतिकारियों और समाज सुधारकॉ की कार्य प्रणाली से अवगत होते रहे ! तथा 'मैरी कूरी' की आत्मकथा का हिंदी अनुवाद भी किया। 
स्वतंत्रता के पश्चात् 
भारत आजाद होने पर, शास्त्री जी अपने गृह प्रदेश उत्तर प्रदेश के संसदीय सचिव नियुक्त किये गए! गोविन्द  बल्लभ पन्त के मंत्री मंडल के पुलिस व यातायात मंत्री बनकर, पहली बार महिला कन्डक्टर की नियुक्ति की ! पुलिस को भीड़ नियंत्रण हेतु उन पर लाठी नहीं, पानी की बौछार का उपयोग के आदेश दिए
1951 में राज्य सभा सदस्य बने तथा कांग्रेस महासचिव के नाते चुनावी बागडोर संभाली, तो 1952, 1957 व 1962 में प्रत्याशी चयन, प्रचार द्वारा जवाहरलाल  नेहरु को संसदीय चुनावों में भारी बहुमत प्राप्त हुआ! केंद्र में 1951 से 1956 तक रेलवे व यातायात मंत्री रहे, 1956 में महबूबनगर की रेल दुर्घटना में 112 लोगों की मृत्यु के पश्चात् भेजे शास्त्रीजी के त्यागपत्र को नेहरुजी ने स्वीकार नहीं किया किन्तु 3 माह पश्चात् तमिलनाडू  के अरियालुर दुर्घटना (मृतक 114) का नैतिक व संवैधानिक दायित्व मान कर दिए त्यागपत्र को स्वीकारते नेहरूजी ने कहा, शास्त्री जी इस दुर्घटना के लिए दोषी नहीं हैं, किन्तु इससे संवैधानिक आदर्श स्थापित करने का आग्रह है! शास्त्री जी के अभूतपूर्व निर्णय की देश की जनता ने भूरी भूरी प्रशंसा की ! 
1957 में, शास्त्री जी संसदीय चुनाव के पश्चात् फिर मंत्रिमंडल में लिए गए, पहले यातायात व संचार मंत्री, बाद में वाणिज्य व उद्योग मंत्री तथा 1961 में गृह मंत्री बने तब क. संथानम की अध्यक्षता में भ्रष्टाचार निवारण कमिटी गठित करने में भी विशेष भूमिका रही ! 
प्रधान मंत्री 
लाल बहादुर शास्त्री  जी  का नेतृत्व 
27 मई 1964 जवाहरलाल नेहरु की मृत्यु से उत्पन्न रिक्तता को 9 जून को भरा गया जब कांग्रेस अध्यक्षक. कामराज ने प्रधान मंत्री पद के लिए एक मृदु भाषी, सौम्य व्यवहार, नेहरूवादी शास्त्री जी को उपयुक्त पाया तथा इस प्रकार पारंपरिक दक्षिणपंथी मोरारजी देसाई का विकल्प स्वीकार हुआ ! प्रधान मंत्री के रूप में राष्ट्र के नाम प्रथम सन्देश में शास्त्री जी ने कहा-
हर राष्ट्र के जीवन में एक समय ऐसा आता है, जब वह इतिहास के चौराहे पर खड़ा होता है और उसे अपनी दिशा निर्धारित करनी होती है ! किन्तु हमें इसमें कोई कठिनाई या संकोच की आवश्यकता नहीं है! कोई इधर उधर देखना नहीं, हमारा मार्ग सीधा व स्पष्ट है! देश में सामाजिक लोकतंत्र के निर्माण से सबको स्वतंत्रता व वैभवशाली बनाते हुए, विश्व शांति तथा सभी देशों के साथ मित्रता! शास्त्री जी, विभिन्न विचारों में सामंजस्य निपुणता के बाद भी, अल्प अवधि के कारण देश के अर्थ संकट व खाद्य संकट का प्रभावी हल न कर पा रहे थे! परन्तु जनता में उनकी लोकप्रियता व सम्मान अत्यधिक था जिससे उन्होंने देश में हरित क्रांति लाकर खाली गोदामों को भरे भंडार में बदल दिया! किन्तु यह देखने के लिए वो जीवित न रहे, पाकिस्तान से 22 दिवसीय युद्ध में, लाल बहादुर शास्त्री जी ने नारा दिया "जय जवान जय किसान" देश के किसान को सैनिक समान बना कर देश की सुरक्षा के साथ अधिक अन्न उत्पादन पर बल दिया! हरित क्रांति व सफेद (दुग्ध) क्रांति के सूत्र धार शास्त्री जी अक्तू.1964 में कैरा जिले में गए। उससे प्रभावित होकर उन्होंने आनंद का देरी अनुभव से सरे देश को सीख दी तथा उनके प्रधानमंत्रित्व काल 1965 में नेशनल देरी डेवेलोपमेंट बोर्ड गठन हुआ! समाजवादी होते हुए भी उन्होंने अपनी अर्थव्यवस्था को किसी का पिछलग्गू नहीं बनाया अपने कार्य काल 1965 में उन्होंने भ्रमण किया रूसयुगोस्लावियाइंग्लैंडकनाडा व बर्मापाकिस्तान से युद्ध 
भारत पाकिस्तानी युद्ध 1965
पाकिस्तान ने आधे कच्छ, पर अपना अधिकार जताते अपनी सेनाएं अगस्त 1965 में भेज दी, जो लोक सभा में, झड़पों में प्रतिपादित हुआ 'भारतीय टेंक की कच्छ की मुठभेढ़ पर शास्त्री जी का वक्तव्य' “अपने सीमित संसाधनों के उपयोग में हमने सदा आर्थिक विकास योजना तथा परियोजनाओं को प्रमुखता दी है, अत: किसी भी चीज को सही परिपेक्ष्य में देखने वाला कोई भी समझ सकता है कि भारत की रूचि सीमा पर अशांति अथवा संघर्ष का वातावरण बनाने में नहीं हो सकती !... इन परिस्थितियों में सरकार का दायित्व बिलकुल स्पष्ट है और इसका निर्वहन पूर्णत: प्रभावी ढंग से किया जायेगा ...यदि आवश्यकता पड़ी तो हम गरीबी में रह लेंगे, किन्तु देश कि स्वतंत्रता पर आँच नहीं आने देंगे!”पाकिस्तान की आक्रामकता का केंद्र है कश्मीर। जब सशस्त्र घुसपैठिये पाकिस्तान से जम्मू एवं कश्मीर राज्य में घुसने आरंभ हुए, शास्त्री जी ने पाकिस्तान को यह स्पष्ट कर दिया, कि ईंट का जवाब पत्थर से दिया जायेगा। अभी सित. 1965 में ही पाक सैनिकों सहित सशस्त्र घुसपैठियों ने सीमा पार करते समय सब अपने अनुकूल समझा होगा, किन्तु ऐसा था नहीं और भारत ने भी युद्ध विराम रेखा (अब नियंत्रण रेखा) के पार अपनी सेना भेज दी है तथा युद्ध होने पर पाकिस्तान को लाहौर के पास अंतर राष्ट्रीय सीमा पर करने कि चेतावनी भी दे दी है! टेंक महा संग्राम हुआ, पंजाब में और जब पाकिस्तानी सेनाओं को कहीं लाभ हुआ, भारतीय सेना ने भी कश्मीर का हाजी पीर का महत्त्व पूर्ण स्थान अधिकार में ले लिया है, तथा पाकिस्तानी शहर लाहौर पर सीधे प्रहार करते रहे! 17 सित.1965, भारत पाक युद्ध के चलते भारत को एक पत्र चीन से मिला। पत्र में, चीन ने भारतीय सेना पर उनकी सीमा में सैन्य उपकरण लगाने का आरोप लगाते, युद्ध की धमकी दी अथवा उसे हटाने को कहा, जिस पर शास्त्री जी ने घोषणा की "चीन का आरोप मिथ्या है! यदि वह हम पर आक्रमण करेगा तो हम अपनी अपनी संप्रभुता की रक्षा करने में सक्षम हैं" चीन ने इसका कोई उत्तर नहीं दिया, किन्तु भारत पाक युद्ध में दोनों ने बहुत कुछ खोया है! भारत पाक युद्ध समाप्त 23 सित. 1965 को संयुक्त राष्ट्र-की युद्ध विराम घोषणा से हुआ। इस अवसर पर प्र.मं.शास्त्री जी ने कहा“ दो देशों की सेनाओं के बीच संघर्ष तो समाप्त हो गया है। संयुक्त राष्ट्र- तथा सभी शांति चाहने वालों के लिए अधिक महत्वपूर्ण है एक गहरे संघर्ष को समाप्त करने के प्रयास करना है... यह कैसे प्राप्त किया जा सकता है ? हमारे विचार से, इसका एक ही हल है, शांतिपूर्ण सह अस्तित्व! भारत इसी सिद्धांत पर खड़ा है; पूरे विश्व का नेतृत्व करता रहा है! उनकी आर्थिक व राजनैतिक विविधता तथा मतभेद कितने भी गंभीर हों, देशों में शांतिपूर्ण सहस्तित्व संभव है !” ताश कन्द का काण्ड युद्ध विराम के बाद, शास्त्री जी तथा  पाकिस्तानी राष्ट्रपति मुहम्मद अयूब खान वार्ता के लिए ताशकन्द (अखंडित रूस, वर्तमान उज्बेकिस्तान) अलेक्सेई कोस्य्गिन के बुलावे पर 10 जन.1966 को गए। ताश कन्द समझौते पर हस्ताक्षर किये! शास्त्री जी को संदेह जनक परिस्थितियों में मृतक बताते, अगले दिन/रात्रि के 1:32 बजे हृदयाघात घोषित किया गया ! यह किसी सरकार के प्रमुख की सरकारी यात्रा पर विदेश में मृत्यु की अनहोनी घटना है। 
शास्त्री जी की मृत्यु का रहस्य ?शास्त्री जी की रहस्यमय मृत्यु पर उनकी विधवा पत्नी ललिता शास्त्री कहती रही, कि उनके पति को विष दिया गया है। कुछ उनके शव का नीला रंग, इसका प्रमाण बताते हैं। शास्त्री जी को विष देने के आरोपी रुसके रसोइये को बंदी भी बनाया गया, किन्तु वो प्रमाण के अभाव में बच गया। 2009 में, जब अनुज धर, लेखक (CIA's Eye on South Asia,) 'RTI' में  (Right to Information Act) प्रधान मंत्री कार्यालय से कहा, कि शास्त्री जी की मृत्यु का कारण सार्वजानिक किया जाये, विदेशों से सम्बन्ध बिगड़ने की बात कह कर टाल दिया गया। देश में असंतोष फैलने व संसदीय विशेषाधिकार का उल्लंघन भी बताया गया। प्रमंका ने इतना तो स्वीकार किया, कि शास्त्री जी की मृत्यु से सम्बंधित एक पत्र कार्यालय के पास है! सरकार ने यह भी स्वीकार किया, कि शव की रूस 'USSR' में 'post-mortem examination' जाँच नहीं की गई, किन्तु शास्त्री जी के वैयक्तिगत चिकित्सक डा. र.न.चुघ ने जाँच कर रपट दी थी! किस प्रकार हर सच को छुपाने का आरोप लगता है और सच का झूठ/झूठ का सच यहाँ सामान्य प्रक्रिया है, कुछ भी हो सकता है।स्मृतिचिन्ह आजीवन सदाशयता व विनम्रता के प्रतीक माने गए, शास्त्री जी एकमात्र ऐसे व्यक्ति थे, जिन्हें मरणोपरांत भारत रत्न से सम्मानित किया गया, व दिल्ली के "विजय घाट" उनका स्मृति चिन्ह बनाया गया ! वे न तो नेहरू खानदान से थे न किसी वोट बेंक समुदाय से फिर भी अनेकों शिक्षण सस्थान, शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासनिक संसथान 'National Academy of Administration' (Mussorie) तथा शास्त्री इंडो -कनाडियन इंस्टिट्यूट आदि उनको समर्पित हैं। 
"यह राष्ट्र जो कभी विश्वगुरु था, आजभी इसमें वह गुण, 
योग्यता व क्षमता विद्यमान है! आओ मिलकर इसे बनायें- तिलक
इतिहास को सही दृष्टी से परखें। गौरव जगाएं, भूलें सुधारें।
आइये, आप ओर हम मिलकर इस दिशा में आगे बढेंगे, देश बड़ेगा । तिलक YDMS